23 मार्च 2014 को प्रान्त में शहीदी दिवस के अवसर पर सभी शाखाओं पर कॉलेज विद्यार्थी उपस्थिति दिवस सम्पन्न हुआ । प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रान्त भर में 111 स्थानों पर 163 शाखाओं में ये कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जिसमें कुल 1420 कॉलेज विद्यार्थियों ने भाग लिया ।
गीता इंजीनियरिंग कॉलेज, नौल्था (पानीपत) में भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत 2071 मनाया गया । आयोजित कार्यक्रम में सर्व प्रथम तिलक लगाकर बधाई दी गयी । श्री विकास जी सह नगर बौद्धिक प्रमुख द्वारा काल गणना व उससे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों के विषय में अवगत करवाया गया एवं अंत में सभी ने स्वामी विवेकानंद जी के चित्र के सम्मुख पुष्प अर्पित कर मन मे संकल्प लिया ।
| गीता इंजीनियरिंग कॉलेज, नौल्था (पानीपत) में भारतीय नववर्ष का कर्यक्रम |
विवेकानंद स्वाध्याय मंडल, हिन्दु कॉलेज, सोनीपत द्वारा देश निर्माण में युवाओं की भूमिका इस विषय पर एक सेमिनार क आयोजन किय गया । मुख्य वक्ता के रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद् के क्षेत्रीय संगठन मंत्री श्रीनिवास जी रहे । जिसमें 200 विद्यार्थी व कॉलेज स्टाफ़ कि सहभागिता रही । अंत में श्रीनिवास जी द्वारा विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं क समधान किया गया ।
19-20 अप्रैल को महेंद्रगढ़ जिले के विद्यार्थीयों का भ्रमण कार्यक्रम मथुरा-वृन्दावन में संपन्न हुआ । श्री राजेश जी शास्त्री ज़िला कार्यवाह पूरा समय उपस्थित रहे ।
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| महेंद्रगढ़ जिले के विद्यार्थी |
19 अप्रैल को प्रान्त कार्यालय रोहतक में शिविर के सम्बन्ध में शारीरिक बौद्धिक व व्यवस्था के विषय में एक बैठक सम्पन्न हुई । जिसमें प्रान्त भर से 20 कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। दोपहर बाद सभी कार्यकर्ता शिविर स्थल बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय परिसर देखने हेतु गये । बैठक में श्री विजय जी सह क्षेत्र कार्यवाह, उत्तर क्षेत्र व श्री सुधीर कुमार जी, प्रान्त प्रचारक हरियाणा विशेष रुप से उपस्थित रहे ।
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| शिविर स्थल बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय परिसर |
अप्रैल मास में सोनीपत व फरिदाबाद ऐसे दो स्थानों पर 12वीं की परीक्षा दिए हुए विद्यार्थियों के कर्यक्रम सम्पन्न हुए । फरीदाबाद में हुए कार्यक्रम में 200+ उपस्थिति रही ।
दस मई 1857, जब क्रान्ति का बिगुल बज उठा
इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतवासियों ने एक दिन के लिए भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। आक्रमणकारी चाहे जो हो; भारतीय वीरों ने संघर्ष की ज्योति को सदा प्रदीप्त रखा। कभी वे सफल हुए, तो कभी अहंकार, अनुशासनहीनता या जातीय दुरभिमान के कारण विफलता हाथ लगी।
अंग्रेजों को भगाने का पहला संगठित प्रयास 1857 में हुआ। इसके लिए 31 मई को देश की सब छावनियों में एक साथ धावा बोलने की योजना बनी थी; पर दुर्भाग्यवश यह विस्फोट मेरठ में 10 मई को ही हो गया। अतः यह योजना सफल नहीं हो सकी परन्तु इसके प्रतिसाद स्वरूप 90 साल बाद हमें स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।
दिल्ली से 70 कि.मी. दूर स्थित मेरठ उन दिनों सेना का एक प्रमुख केन्द्र था। वहां छावनी में बाबा औघड़नाथ का प्रसिद्ध शिवमन्दिर था। इसका शिवलिंग स्वयंभू है। अर्थात वह स्वाभाविक रूप से धरती से ही प्रकट हुआ है। इस कारण मन्दिर की सैनिकों तथा दूर-दूर तक हिन्दू जनता में बड़ी मान्यता थी।
मन्दिर के शान्त एवं सुरम्य वातावरण को देखकर अंग्रेजों ने यहां सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र बनाया। भारतीयों का रंग अपेक्षाकृत सांवला होता है, इसी कारण यहां स्थित पल्टन को ‘काली पल्टन’ और इस मन्दिर को ‘काली पल्टन का मन्दिर’ कहा जाने लगा। मराठों के अभ्युदय काल में अनेक प्रमुख पेशवाओं ने अपनी विजय यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व यहां पूजा-अर्चना की थी। इस मन्दिर में क्रान्तिकारी लोग दर्शन के बहाने आकर सैनिकों से मिलते और योजना बनाते थे। कहते हैं कि नानासाहब पेशवा भी साधु वेश में हाथी पर बैठकर यहां आते थे। इसलिए लोग उन्हें ‘हाथी वाले बाबा’ कहते थे।
नानासाहब, अजीमुल्ला खाँ, रंगो बापूजी गुप्ते आदि ने 31 मई को क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना बनाई थी। छावनियों व गांवों में रोटी और कमल द्वारा सन्देश भेजे जा रहे थे; पर अचानक एक दुर्घटना हो गयी। 29 मार्च को बंगाल की बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे के नेतृत्व में कुछ सैनिकों ने समय से पूर्व ही विद्रोह का बिगुल बजाकर कई अंग्रेज अधिकारियों का वध कर दिया।
इसकी सूचना मेरठ पहुंचते ही अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों से शस्त्र रखवा लिये। सैनिकों को यह बहुत खराब लगा। वे स्वयं को पहले ही अपमानित अनुभव कर रहे थे। क्योंकि मेरठ के बाजार में घूमते समय अनेक वेश्याओं ने उन पर चूडि़यां फेंककर उन्हें कायरता के लिए धिक्कारा था।
बंगाल में हुए विद्रोह से उत्साहित तथा वेश्याओं के व्यवहार से आहत सैनिकों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने 31 मई की बजाय 10 मई, 1857 को ही हल्ला बोलकर सैकड़ों अंग्रेजों को मार डाला। उनके नेताओं ने अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम बताते हुए उन्हें बहुत समझाया; पर वे नहीं माने।
मेरठ पर कब्जा कर वे दिल्ली चल दिये। कुछ दिन तक दिल्ली भी उनके कब्जे में रही। इस दल में लगभग 250 सैनिक वहाबी मुस्लिम थे। उन्होंने दिल्ली जाकर बिना किसी योजना के उस बहादुरशाह ‘जफर’ को क्रान्ति का नेता घोषित कर दिया, जिसके पैर कब्र में लटक रहे थे। इस प्रकार समय से पूर्व योजना फूटने से अंगे्रज संभल गये और उन्होंने क्रान्ति को कुचल दिया।
मेरठ छावनी में प्राचीन सिद्धपीठ का गौरव प्राप्त ‘काली पल्टन का मन्दिर’ आज नये और भव्य स्वरूप में खड़ा है। 1996 ई. में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के हाथों मन्दिर का पुनरुद्धार हुआ।






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