Wednesday, April 30, 2014

तरुणोदय सन्देश मई 2014


                
 अप्रैल मास की गतिविधियां 

               23 मार्च 2014 को प्रान्त में शहीदी दिवस के अवसर पर सभी शाखाओं पर कॉलेज विद्यार्थी उपस्थिति दिवस सम्पन्न हुआ । प्राप्त जानकारी के अनुसार प्रान्त भर में 111 स्थानों पर 163 शाखाओं में ये कार्यक्रम सम्पन्न हुए, जिसमें कुल 1420  कॉलेज  विद्यार्थियों  ने  भाग लिया ।

                  गीता इंजीनियरिंग कॉलेज, नौल्था (पानीपत) में भारतीय नववर्ष विक्रमी संवत 2071 मनाया गया । आयोजित कार्यक्रम में सर्व प्रथम तिलक लगाकर बधाई दी गयी । श्री विकास जी सह नगर बौद्धिक प्रमुख द्वारा काल गणना  व उससे जुड़े ऐतिहासिक तथ्यों के विषय में अवगत करवाया गया एवं  अंत  में  सभी ने स्वामी विवेकानंद जी के चित्र के सम्मुख पुष्प अर्पित कर मन मे संकल्प लिया । 


गीता इंजीनियरिंग कॉलेज, नौल्था (पानीपत) में भारतीय नववर्ष का कर्यक्रम 

                      विवेकानंद स्वाध्याय मंडल, हिन्दु  कॉलेज, सोनीपत द्वारा देश निर्माण में युवाओं की  भूमिका इस विषय पर एक सेमिनार क आयोजन किय गया । मुख्य वक्ता   के रूप में अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद्  के क्षेत्रीय संगठन मंत्री श्रीनिवास जी रहे । जिसमें 200 विद्यार्थी व कॉलेज स्टाफ़ कि सहभागिता रही । अंत में श्रीनिवास जी द्वारा विद्यार्थियों की जिज्ञासाओं क समधान किया गया ।

                      19-20 अप्रैल को महेंद्रगढ़ जिले के विद्यार्थीयों का भ्रमण कार्यक्रम मथुरा-वृन्दावन में संपन्न  हुआ । श्री राजेश जी शास्त्री ज़िला कार्यवाह पूरा समय उपस्थित रहे । 
महेंद्रगढ़ जिले के विद्यार्थी
इसी प्रकार से झज्जर जिले के कार्यकर्ता भी भ्रमण हेतु मथुरा-वृन्दावन गए 
झज्जर जिले के कार्यकर्ता



                      19 अप्रैल को प्रान्त कार्यालय रोहतक में शिविर के सम्बन्ध में शारीरिक बौद्धिक व व्यवस्था के विषय में एक बैठक सम्पन्न हुई । जिसमें प्रान्त भर से 20  कार्यकर्ताओं ने भाग लिया। दोपहर बाद सभी कार्यकर्ता शिविर स्थल बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय परिसर देखने हेतु गये । बैठक में श्री विजय जी सह क्षेत्र कार्यवाह, उत्तर क्षेत्र  व श्री सुधीर कुमार जी, प्रान्त प्रचारक हरियाणा विशेष रुप से उपस्थित रहे ।  


 शिविर स्थल बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय परिसर

                       अप्रैल मास में सोनीपत व फरिदाबाद ऐसे दो स्थानों पर 12वीं की परीक्षा दिए हुए विद्यार्थियों के कर्यक्रम सम्पन्न हुए । फरीदाबाद में हुए कार्यक्रम में 200+ उपस्थिति रही । 




दस मई 1857, जब क्रान्ति का बिगुल बज उठा


इतिहास इस बात का साक्षी है कि भारतवासियों ने एक दिन के लिए भी पराधीनता स्वीकार नहीं की। आक्रमणकारी चाहे जो हो; भारतीय वीरों ने संघर्ष की ज्योति को सदा प्रदीप्त रखा। कभी वे सफल हुए, तो कभी अहंकार, अनुशासनहीनता या जातीय दुरभिमान के कारण विफलता हाथ लगी। 


अंग्रेजों को भगाने का पहला संगठित प्रयास 1857 में हुआ। इसके लिए 31 मई को देश की सब छावनियों में एक साथ धावा बोलने की योजना बनी थी; पर दुर्भाग्यवश यह विस्फोट मेरठ में 10 मई को ही हो गया। अतः यह योजना सफल नहीं हो सकी परन्तु इसके प्रतिसाद स्वरूप  90 साल बाद हमें स्वतन्त्रता प्राप्त हुई।


दिल्ली से 70 कि.मी. दूर स्थित मेरठ उन दिनों सेना का एक प्रमुख केन्द्र था। वहां छावनी में बाबा औघड़नाथ का प्रसिद्ध शिवमन्दिर था। इसका शिवलिंग स्वयंभू है। अर्थात वह स्वाभाविक रूप से धरती से ही प्रकट हुआ है। इस कारण मन्दिर की सैनिकों तथा दूर-दूर तक हिन्दू जनता में बड़ी मान्यता थी।


मन्दिर के शान्त एवं सुरम्य वातावरण को देखकर अंग्रेजों ने यहां सैनिक प्रशिक्षण केन्द्र बनाया। भारतीयों का रंग अपेक्षाकृत सांवला होता है, इसी कारण यहां स्थित पल्टन को ‘काली पल्टन’ और इस मन्दिर को ‘काली पल्टन का मन्दिर’ कहा जाने लगा। मराठों के अभ्युदय काल में अनेक प्रमुख पेशवाओं ने अपनी विजय यात्रा प्रारम्भ करने से पूर्व यहां पूजा-अर्चना की थी। इस मन्दिर में क्रान्तिकारी लोग दर्शन के बहाने आकर सैनिकों से मिलते और योजना बनाते थे। कहते हैं कि नानासाहब पेशवा भी साधु वेश में हाथी पर बैठकर यहां आते थे। इसलिए लोग उन्हें ‘हाथी वाले बाबा’ कहते थे। 


नानासाहब, अजीमुल्ला खाँ, रंगो बापूजी गुप्ते आदि ने 31 मई को क्रान्ति की सम्पूर्ण योजना बनाई थी। छावनियों व गांवों में रोटी और कमल द्वारा सन्देश भेजे जा रहे थे; पर अचानक एक दुर्घटना हो गयी। 29 मार्च को बंगाल की बैरकपुर छावनी में मंगल पांडे के नेतृत्व में कुछ सैनिकों ने समय से पूर्व ही विद्रोह का बिगुल बजाकर कई अंग्रेज अधिकारियों का वध कर दिया।


इसकी सूचना मेरठ पहुंचते ही अंग्रेज अधिकारियों ने भारतीय सैनिकों से शस्त्र रखवा लिये। सैनिकों को यह बहुत खराब लगा। वे स्वयं को पहले ही अपमानित अनुभव कर रहे थे। क्योंकि मेरठ के बाजार में घूमते समय अनेक वेश्याओं ने उन पर चूडि़यां फेंककर उन्हें कायरता के लिए धिक्कारा था।


बंगाल में हुए विद्रोह से उत्साहित तथा वेश्याओं के व्यवहार से आहत सैनिकों का धैर्य जवाब दे गया। उन्होंने 31 मई की बजाय 10 मई, 1857 को ही हल्ला बोलकर सैकड़ों अंग्रेजों को मार डाला। उनके नेताओं ने अनुशासनहीनता के दुष्परिणाम बताते हुए उन्हें बहुत समझाया; पर वे नहीं माने। 


मेरठ पर कब्जा कर वे दिल्ली चल दिये। कुछ दिन तक दिल्ली भी उनके कब्जे में रही। इस दल में लगभग 250 सैनिक वहाबी मुस्लिम थे। उन्होंने दिल्ली जाकर बिना किसी योजना के उस बहादुरशाह ‘जफर’ को क्रान्ति का नेता घोषित कर दिया, जिसके पैर कब्र में लटक रहे थे। इस प्रकार समय से पूर्व योजना फूटने से अंगे्रज संभल गये और उन्होंने क्रान्ति को कुचल दिया।


मेरठ छावनी में प्राचीन सिद्धपीठ का गौरव प्राप्त ‘काली पल्टन का मन्दिर’ आज नये और भव्य स्वरूप में खड़ा है। 1996 ई. में जगद्गुरु शंकराचार्य स्वामी कृष्णबोधाश्रम जी के हाथों मन्दिर का पुनरुद्धार हुआ।


             

Monday, April 28, 2014

चतुर्थ सरसंघचालक प्रो0 राजेन्द्र सिंह जी

                 राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के चतुर्थ सरसंघचालक प्रो0 राजेन्द्र सिंह का जन्म 29 जनवरी, 1922 को ग्राम बनैल (जिला बुलन्दशहर, उत्तर प्रदेश) के एक सम्पन्न एवं शिक्षित परिवार में हुआ था। उनके पिता कुँवर बलबीर सिंह अंग्रेज शासन में पहली बार बने भारतीय मुख्य अभियन्ता थे। इससे पूर्व इस पद पर सदा अंग्रेज ही नियुक्त होते थे। राजेन्द्र सिंह को घर में सब प्यार से रज्जू कहते थे। आगे चलकर उनका यही नाम सर्वत्र लोकप्रिय हुआ। 
                  रज्जू भैया बचपन से ही बहुत मेधावी थे। उनके पिता की इच्छा थी कि वे प्रशासनिक सेवा में जायें। इसीलिए उन्हें पढ़ने के लिए प्रयाग भेजा गया; पर रज्जू भैया को अंग्रेजों की गुलामी पसन्द नहीं थी उन्होंने प्रथम श्रेणी में एम-एस.सी. उत्तीर्ण की और फिर वहीं भौतिक विज्ञान के प्राध्यापक हो गये। उनकी एम-एस.सी. की प्रयोगात्मक परीक्षा लेने नोबेल पुरस्कार विजेता डा0 सी.वी.रमन आये थे। वे उनकी प्रतिभा से बहुत प्रभावित हुए तथा उन्हें अपने साथ बंगलौर चलकर शोध करने का आग्रह किया; पर रज्जू भैया के जीवन का लक्ष्य तो कुछ और ही था। 
               प्रयाग में उनका सम्पर्क संघ से हुआ और वे नियमित शाखा जाने लगे। संघ के तत्कालीन सरसंघचालक श्री गुरुजी से वे बहुत प्रभावित थे। 1943 में रज्जू भैया ने काशी से प्रथम वर्ष संघ शिक्षा वर्ग का प्रशिक्षण लिया। वहाँ श्री गुरुजी का ‘शिवाजी का पत्र, जयसिंह के नाम’ विषय पर जो बौद्धिक हुआ, उससे प्रेरित होकर उन्होंने अपना जीवन संघ कार्य हेतु समर्पित कर दिया। अब वे अध्यापन कार्य के अतिरिक्त शेष सारा समय संघ कार्य में लगाने लगे। उन्होंने घर में बता दिया कि वे विवाह के बन्धन में नहीं बधेंगे। प्राध्यापक रहते हुए रज्जू भैया अब संघ कार्य के लिए अब पूरे उ.प्र.में प्रवास करने लगे। वे अपनी कक्षाओं का तालमेल ऐसे करते थे, जिससे छात्रों का अहित न हो तथा उन्हें सप्ताह में दो-तीन दिन प्रवास के लिए मिल जायें। पढ़ाने की रोचक शैली के कारण छात्र उनकी कक्षा के लिए उत्सुक रहते थे।
                     रज्जू भैया सादा जीवन उच्च विचार के समर्थक थे। वे सदा तृतीय श्रेणी में ही प्रवास करते थे तथा प्रवास का सारा व्यय अपनी जेब से करते थे। इसके बावजूद जो पैसा बचता था, उसे वे चुपचाप निर्धन छात्रों की फीस तथा पुस्तकों पर व्यय कर देते थे। 
                     1966 में उन्होंने विश्वविद्यालय की नौकरी से त्यागपत्र दे दिया और पूरा समय संघ को ही देने लगे। अब उन पर उत्तर प्रदेश के साथ बिहार का काम भी आ गया। वे एक अच्छे गायक भी थे। संघ शिक्षा वर्ग की गीत कक्षाओं में आकर गीत सीखने और सिखाने में उन्हें कोई संकोच नहीं होता था।सरल उदाहरणों से परिपूर्ण उनके बौद्धिक ऐसे होते थे, मानो कोई अध्यापक कक्षा ले रहा हो। उनकी योग्यता के कारण उनका कार्यक्षेत्र क्रमशः बढ़ता गया। आपातकाल के समय भूमिगत संघर्ष को चलाये रखने में रज्जू भैया की बहुत बड़ी भूमिका थी। उन्होंने प्रोफेसर गौरव कुमार के छद्म नाम से देश भर में प्रवास किया। जेल में जाकर विपक्षी नेताओं से भेंट की और उन्हें एक मंच पर आकर चुनाव लड़ने को प्रेरित किया। इसी से इन्दिरा गांधी की तानाशाही का अन्त हुआ। 
                    1977 में रज्जू भैया सह सरकार्यवाह, 1978 में सरकार्यवाह और 1994 में सरसंघचालक बने। उन्होंने देश भर में प्रवास कर स्वयंसेवकों को कार्य विस्तार की प्रेरणा दी। बीमारी के कारण उन्होंने 2000 ई0 में श्री सुदर्शन जी को यह दायित्व दे दिया। इसके बाद भी वे सभी कार्यक्रमों में जाते रहे। अन्तिम समय तक सक्रिय रहते हुए 14 जुलाई, 2003 को कौशिक आश्रम, पुणे में रज्जू भैया का देहान्त हो गया।


Wednesday, April 23, 2014

पू. बालासाहब जी देवरस (1915-96)

तृतीय सरसंघचालक  
नागपुर में जन्म, 1927 में स्वयंसेवक बने, 1939 में प्रचारक, डा. हेडगेवार जी के सहयोगी के रूप में कार्य किया, 1973 से 1994 तक सरसंघचालक रहे। जीवित रहते सरसंघचालक का दायित्व मा. रज्जु भैय्या जी को सौंपा। आपके मार्गदर्शन में डा. हेडगेवार जन्मशती के समय सेवा विभाग का प्रारंभ हुआ।

Saturday, April 12, 2014

संघ स्थापना

डा. केशव बलिराम हेडगेवार जी ने 1925 में विजयादशमी के शुभ मुहूर्त पर भारत की सर्वंगीण उन्नति का सपना आँखों के समक्ष रखकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की।

प.पू. श्रीगुरूजी

 संघ के द्वितीय सरसंघचालक प.पू.माधव सदाशिव गोलवलकर(1906-73)

काशी हिन्दू विश्वविद्यालय से Msc प्राणी शास्त्र में पढाई की, वहीं मतस्य विभाग में प्राध्यापक के रूप में कार्य किया। विवेकानंद के गुरु भाई स्वामी अखंडानंद जी से संन्यास की दीक्षा प्राप्त की व संघ कार्य हेतु जीवन समर्पित कर दिया।
33 वर्षों (1940-73) तक सरसंघचालक रहे। इस दौरान 65 बार पूरे देश का भ्रमण किया।                                                                            

Tuesday, April 1, 2014

तरुणोदय सन्देश


तरुणोदय सन्देश का यहवर्ष प्रतिपदा अंक’ आपके सामने प्रस्तुत है| 

विभाग अनुसार महविद्यालयीन विद्यार्थी शिविर संपन्न

    तरुणोदय 2014 की पूर्व तैयारी के चरण में गत जनवरीफरवरी  मास में विभाग  अनुसार  शिविरों का आयोजन किया गया | विभाग शिविरों में कॉलेज विद्यार्थियों ने शारीरिक बौद्धिक कार्यक्रमों में बढ़-चढ़ कर भाग लिया | तरुणोदय 2014  के लिए भी नई उर्जा  नये उत्साह का संचार सभी में देखने को मिला |
      संख्या की दृष्टि से पुरे प्रान्त में 53 नगर 97 खंडों का   प्रतिनिधित्व सहित 287 स्थानों से 1110  संख्या रही | इसमें विभाग अनुसार अम्बाला विभाग-234, कुरुक्षेत्र-141, रोहतक-139, फरीदाबाद-256, भिवानी-224 हिसार विभाग के शिविर में 116 विद्यार्थियों की सहभागिता रही |
       12वीं कक्षा के 240 विद्यार्थी, 654 कॉलेज विद्यार्थी 216 अन्य  कार्यकर्ता  शिविरों  में उपस्थित रहे | 224 शिक्षण संस्थानों की भागीदारी हुई एवं 30-35 % ऐसे विद्यार्थी थे जिनका संघ के किसी कार्यक्रम में पहली बार रहना हुआ |

   शिविरों में मा. इन्द्रेश जी-.भा.कार्यकारिणी सदस्य, मा.  रामेश्वर जी-क्षेत्र प्रचारक, मा. प्रेम कुमार जी-सह क्षेत्र प्रचारक, मा. कश्मीरीलाल जी-राष्ट्रीय  संगठन मंत्री स्वदेशी  जागरण मंच, श्री सतीश जी-राजस्थान उत्तर क्षेत्र संगठन मंत्री स्वदेशी जागरण मंच, श्री सुधीर जी-प्रान्त प्रचारक, श्री देवप्रसाद जी- प्रान्त कार्यवाह, श्री प्रताप जी-सह प्रान्त कार्यवाह -  अखिल भारतीय, क्षेत्रीय प्रांतीय अधिकारीयों का मार्गदर्शन शिविरार्थियों को प्राप्त हुआ |   


छात्रावासों के भ्रमण कार्यक्रम

आदि बद्री में पानीपत जिले के स्वयंसेवक
विश्वविद्यालय कार्य की मजबूती के लिए मार्च मास में कुछ जिलों के भ्रमण कार्यक्रम ऐतिहासिक स्थानों पर संपन्न हुए| जिसमें कुरुक्षेत्र जिले के स्वयंसेवक अमृतसर भ्रमण हेतु गए तो पानीपत जिले के स्वयंसेवक सरस्वती उद्गम स्थल आदिबद्री जा कर आए | वही रोहतक जिले के कार्यकर्ता श्रीकृष्ण जन्मभूमि मथुरा-वृन्दावन गए | फरीदाबाद जिले के विश्वविद्यालय प्रमुखों का भ्रमण कार्यक्रम सतयुग दर्शन कॉलेज, ध्यानकेंद्र, भूपानी ग्राम, फरीदाबाद में संपन्न हुआ | 

ऐतिहासिक स्थानों से राष्ट्र भक्ति का भाव व अपने स्थान पर महाविद्यालीन कार्य के लिए नया उत्साह एवं उर्जा लेकर सभी अपने स्थानों पर लौट आए और कार्य वृद्धि हेतु तन्मय होकर लग गए |

  

मथुरा में रोहतक जिले के स्वयंसेवक 


शहीदी दिवस 23 मार्च


दीप प्रज्ज्वलन करते कॉलेज  डायरेक्टर श्री प्रीत सिंह जी, साथ में फरीदाबाद विभाग प्रचारक श्री विजय जी  
गुडगाँव नेशनल लॉ कॉलेज में शहीदी दिवस पर पुष्पार्पण करते विद्यार्थी
23 मार्च को शहीदी दिवस के अवसर पर प्रान्त की सभी (सायं व प्रभात) शाखाओं पर कॉलेज विद्यार्थी दिवस मनाया गया | यह कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुआ |

प्रान्त के कुछ शैक्षणिक संस्थानों में भी शहीदी दिवस पर श्रद्धांजलि कार्यक्रम संपन्न हुए | जिसमें नेशनल लॉ कॉलेज गुडगाँव, YMCA फरीदाबाद, जींद जिले में जींद व नरवाना नगर आदि स्थानों के कार्यक्रम प्रमुख थे |
YMCA फरीदाबाद में शहीदी दिवस का कार्यक्रम