तरुणोदय सन्देश
मास जून-जुलाई 2014 अंक 3
जून मास में संघ शिक्षा वर्ग के कारण पिछला अंक प्रकाशित नहीं कर पाए अतः खेद प्रकट करते है | जून व जुलाई का यह संयुक्त अंक आपके लिए प्रस्तुत है | पाठकों से निवेदन है कि 'तरुणोदय सन्देश' को और अच्छा बनाने सम्बन्धी कोई सुझाव है अथवा कार्यक्षेत्र में कोई गतिविधि जो इसमें प्रकाशन के योग्य है तो tarunoday2014@gmail.com इस ईमेल पर प्रेषित करे |
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| परम पवित्र भगवा ध्वज |
गुरु पूर्णिमा पर विशेष
मगध के छिन्न-भिन्न हो रहे साम्राज्य को कौन बचाता अगर चन्द्रगुप्त के चाणक्य ना होते? बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों से हिन्दू राष्ट्र की रक्षा कौन करता अगर छत्रपति शिवाजी के समर्थ गुरु रामदास ना होते? गुरू गोविंद सिंह का खलसा पंथ कैसे सिरजा जाता तथा भारत और समाज की रक्षा कैसे होती अगर गुरु ग्रंथ साहिब की अमर बाणी ना होती? वर्तमान भारतवर्ष की पराधीनता की बेडि़यां तोड़कर स्वतंत्रता और हिन्दू स्वाभिमान की क्रांति कैसे प्रारंभ होती अगर डा. हेडगेवार के साथ भगवा ध्वज की शाश्वत बलिदानी परम्परा का गुरु-बल ना होता?
भारत के प्राण सभ्यतामूलक संस्थाओं में बसे हैं। माता, पिता और गुरु-ये वे संस्थान हैं जिन्होंने इस देश की हवा, पानी और मिट्टी को बचाया। रामचरित मानस में श्रीराम के बाल्यकाल के गुणों में सबसे प्रमुख है मात-पिता गुरु नाविही माथा। वे माता-पिता और गुरु के आदेश से बंधे थे और जो भी धर्म तथा देश के हित में हो वही आदेश उन्हें माता-पिता और गुरु से प्राप्त होता था। जब वे किशोरवय ही थे और उनकी मसें भी नहीं भीगी थीं तभी गुरु वशिष्ठ उन्हें देश, धर्म और समाज की रक्षा के लिए उनके पिता दशरथ से मांग कर ले गये। जब देश संकट में हो और धर्म पर मर्दायाहीनता का आक्रमण हो तो समाज के तरुण और युवा शक्ति क्या सिर्फ अपना कैरियर और भविष्य को बनाने में लगी रहे? यह गुरू का ही प्रताप और मार्गदर्शन होता है कि वह समाज को राष्ट्र तथा धर्म की रक्षा के लिए जागृत और चैतन्य करे।
यदि राष्ट्र के घटकों की स्मृति में त्याग, तप और बलिदान की विजयशाली परम्परा जीवित है तो दुनिया की कोई शक्ति ना उन्हें परस्त कर सकती है और ना ही पराधीन बना सकती है।
जब कश्मीर के हिन्दू पंडितों पर संकट आया और इस्लाम के आक्रमणकारियों ने उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ दिया तो कश्मीर से 11 पंडित गुरु तेग बहादुर साहिब के पास आये। उनकी व्यथा सुनकर गुरु तेग बहादुर साहिब बहुत पीडि़त हुए। उनके मुंह से शब्द निकले कि आपकी रक्षा के लिए तो किसी महापुरुष को बलिदान देना होगा। उस समय नन्हें बालक गोबिंद सिंह, जो कालांतर में गुरु गोबिंद कहलाए, हाथ जोड़कर बोले, हे सच्चे पातशाह, आपसे बढ़कर महापुरुष कौन हो सकता है? गुरु तेग बहादुर साहिब ने गोबिंद सिंह को आशीर्वाद दिया और कश्मीरी पंडितों की रक्षा की। यह गुरु तेग बहादुर साहिब का बलिदान ही था कि उन्हें हिन्द की चादर कहा गया। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों साहिबजादे, जोरावर सिंह और फतेह सिंह सरहंद के किले में काजी के द्वारा जिंदा दीवार में चिनवा दिये गये। वीर हकीकत राय ने धर्म के लिए प्राण दे दिये लेकिन धर्म नहीं छोड़ा। यह कौन सी शक्ति थी जो उनके पीछे काम कर रही थी? वह कौन सा ज्ञान धन था कि जिसने इन वीरों के ह्रदय में राष्ट्रधर्म की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग करने की हिम्मत भर दी? आचार्य बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी अमरकृति आनंद मठ में उन्हीं महान आचार्यों की खड्गधारी परम्परा का अद्भुत और आग्नेय वर्णन किया है जो भवानी भारती की रक्षा के लिए शत्रु दल का वैसे ही संहार करते गये जैसे महिषासुर मर्दिनी शत्रुओं का दलन करती है। वंदेमातरम् के जयघोष के साथ जब संन्यासी योद्धा अश्व पर सवार होकर शत्रुओं पर वार करते थे तो अरिदल संख्या में अधिक होते हुए भी काई की तरह फटता जाता था। वंदेमातरम् से विजयी आकाश नादित हो उठता था।
डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की तो परम पवित्र भगवा ध्वज को अपना गुरू मानने के पीछे यही कारण था कि वे शताब्दियों से सिंचित सभ्यता और संस्कृति के बल से हिन्दू राष्ट्र को जीवंत करना चाहते थे। यदि राष्ट्र के घटकों की स्मृति में त्याग, तप और बलिदान की विजयशाली परम्परा जीवित है तो दुनिया की कोई शक्ति ना उन्हें परस्त कर सकती है और ना ही पराधीन बना सकती है। भगवा ध्वज रामकृष्ण, दक्षिण के चोल राजाओं, सम्राट कृष्णदेव राय, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह और महाराजा रणजीत सिंह की पराक्रमी परम्परा और सदा विजयी भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। इसमें यदि सम्राट हर्ष और विक्रमादित्य का प्रजा वत्सल राज्य अभिव्यक्त होता है तो व्यास, दधीचि और समर्थ गुरु रामदास से लेकर स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानंद, महर्षि अरविंद, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद तक का वह आध्यात्मिक तेज भी प्रकट होता है जिसने राष्ट्र और धर्म को संयुक्त किया तथा आदिशंकर की वाणी से यह घोषित करवाया कि राष्ट्र को जोड़ते हुए ही धर्म प्रतिष्ठित हो सकता है। जो धर्म साधना राष्ट्र और जन से विमुख हो केवल अपने मोक्ष के लिए कामना करे वह धर्म साधना भारत के गुरुओं ने कभी प्रतिष्ठित नहीं की। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते हुए उसका उद्देश्य 'आत्मनो मोक्षार्थ जगद् हिताय च' रखा। अर्थात मनुष्यों के कल्याण में ही मेरा मोक्ष है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का रक्षा कवच बना और उसके स्वयंसेवक प्रधानमंत्री पद से लेकर देश के सीमावर्ती गांवों तक में भारत के नये अभ्युदय के लिए कार्य कर रहे हैं और इसके पीछे भारत की सभ्यता और संस्कृति का तपोमय बल है जो गुरु परम्परा से ही जीवित रहा है। इसलिए गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देश भर में करोड़ों स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष प्रणाम निवेदित करते हुए शुद्ध समर्पण भाव से गुरु-दक्षिणा अर्पित करते हैं। यह न तो शुल्क है और न ही चंदा। यह राष्ट्र के लिए बलिदानी भाव से ओत-प्रोत स्वयंसेवकों का श्रद्धामय प्रणाम ही होता है जो दक्षिणा राष्ट्र रक्षा करते हुए शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास को दी। राष्ट्र रक्षा का वही संकल्प संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज को अर्पित करते हैं।
गुरुग्राम नगर में एकत्रीकरण के दृश्य
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| गुरुग्राम नगर एकत्रीकरण |
"प्रशिक्षण वर्ग संपन्न"
गत 1-22 जून को हरियाणा प्रान्त का संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष सामान्य श्रीमद भगवद गीता वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, कुरुक्षेत्र में संपन्न हुआ | जिसमें प्रान्त भर से 262 स्थानों से 468 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया जिसमें 116 महाविद्यालयीन विद्यार्थी भी सम्मिलित है |
इसी प्रकार तृतीय वर्ष सामान्य में 14, द्वितीय वर्ष सामान्य में 73, प्रथम वर्ष विशेष में 49 व द्वितीय वर्ष विशेष में 32 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया |
जून मास के अंतिम सप्ताह में विभाग अनुसार संपन्न हुए 7 प्राथमिक शिक्षा वर्गों में 627 स्थानों से 1796 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण लिया |
प्रान्त बैठक संपन्न
गत 12-13 जुलाई 2014 को शिक्षा भारती, जगदीश कालोनी, रोहतक में नगर/खंड पर्यंत कॉलेज विद्यार्थी प्रमुखों की प्रान्त बैठक संपन्न हुई | प्रान्त भर से 18 जिलों से 60 कार्यकर्ता बैठक में उपस्थित रहे | बैठक में गत कार्यों की समीक्षा (यथा तैयारी के चरण, पंजीकरण की स्थिति, प्रशिक्षण वर्ग), 'तरुणोदय शिविर' को ध्यान में रखते हुए प्रान्त में महाविद्यालयीन कार्य की स्थिति एवं आगामी योजना, अपने क्षेत्र में सक्रिय केन्द्रों की योजना व उसके स्थायित्व की ओर ध्यान इन विषयों पर विचार व अधिकारियों द्वारा मार्गदर्शन हुआ | बैठक में समारोप में मा.सीताराम जी व्यास, उत्तर क्षेत्र कार्यवाह का पाथेय के रूप में उदबोधन हुआ | प्रान्त प्रचारक श्री सुधीर कुमार जी व सह प्रान्त कार्यवाह श्री प्रताप सिंह जी का मार्गदर्शन भी बैठक में प्राप्त हुआ |
"तरुणोदय शिविर" की तिथियाँ 27-28-29 मार्च 2015 निश्चित हो चुकी हैं। प.पू. सरसंघचालक जी का मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
तैयारी के चरणों में कुछ संशोधन है, कृपया उसी अनुसार अपने यहाँ योजना बने व प्रयास हो |
- 15 अगस्त 2014 - प्रत्येक नगर/खण्ड का कॉलेज विद्यार्थी(12वीं भी) एकत्रीकरण रूप में अखण्ड भारत संकल्प दिवस कार्यक्रम
- 25-31 अगस्त - छात्रावासों/कॉलेज परिसरों में नूतन छात्र अभिनन्दन कार्यक्रम
- 19-20-21 सितम्बर - जिलानुसार तरुणोदय संकल्प शिविर। (पंजीकरण की अंतिम तिथि भी यही रहेगी)।
अपने को जो अतिरिक्त समय शिविर तैयारी हेतु मिला है, उसका हम बढ़िया से उपयोग करें।
19 जुलाई/इतिहास-स्मृति - जलियांवाला के प्रतिशोधी ऊधमसिंह
ऊधमसिंह का जन्म ग्राम सुनाम ( जिला संगरूर, पंजाब) में 26 दिसम्बर, 1899 को सरदार टहलसिंह के घर में हुआ था। मात्र दो वर्ष की अवस्था में ही इनकी माँ का और सात साल का होने पर पिता का देहान्त हो गया। ऐसी अवस्था में किसी परिवारजन ने इनकी सुध नहीं ली। गली-गली भटकने के बाद अन्ततः इन्होंने अपने छोटे भाई के साथ अमृतसर के पुतलीघर में शरण ली। यहाँ एक समाजसेवी ने इनकी सहायता की।
19 वर्ष की तरुण अवस्था में ऊधमसिंह ने 13 अपै्रल, 1919 को बैसाखी के पर्व पर जलियाँवाला बाग, अमृतसर में हुए नरसंहार को अपनी आँखों से देखा। सबके जाने के बाद रात में वे वहाँ गये और रक्तरंजित मिट्टी माथे से लगाकर इस काण्ड के खलनायकों से बदला लेने की प्रतिज्ञा की। कुछ दिन उन्होंने अमृतसर में एक दुकान भी चलायी। उसके फलक पर उन्होंने अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ लिखवाया था। इससे स्पष्ट है कि वे स्वतन्त्रता के लिए सब धर्म वालों का सहयोग चाहते थे।
ऊधमसिंह को सदा अपना संकल्प याद रहता था। उसे पूरा करने हेतु वे अफ्रीका से अमरीका होते हुए 1923 में इंग्लैंड पहुँच गये। वहाँ क्रान्तिकारियों से उनका सम्पर्क हुआ। 1928 में वे भगतसिंह के कहने पर वापस भारत आ गये; पर लाहौर में उन्हें शस्त्र अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में पकड़कर चार साल की सजा दी गयी। इसके बाद वे फिर इंग्लैंड चले गये। तब तक जलियांवाला बाग में गोली चलाने वाला जनरल डायर अनेक शारीरिक व मानसिक रोगों से ग्रस्त होकर 23 जुलाई, 1927 को आत्महत्या कर चुका था; पर पंजाब का तत्कालीन गवर्नर माइकेल ओडवायर अभी जीवित था।
13 मार्च, 1940 को वह शुभ दिन आ गया, जिस दिन ऊधमसिंह को अपना संकल्प पूरा करने का अवसर मिला। इंग्लैंड की राजधानी लन्दन के कैक्स्टन हॉल में एक सभा होने वाली थी। इसमें जलियाँवाला बाग काण्ड के दो खलनायक सर माइकेल ओडवायर तथा भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी अ१फ स्टेट लार्ड जेटलैंड आने वाले थे। ऊधमसिंह चुपचाप मंच से कुछ दूरी पर जाकर बैठ गये और उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे।
माइकेल ओडवायर ने अपने भाषण में भारत के विरुद्ध बहुत विषवमन किया। भाषण पूरा होते ही ऊधमसिंह ने गोली चला दी। ओडवायर वहीं ढेर हो गया। अब लार्ड जैटलैंड की बारी थी; पर उसका भाग्य अच्छा था। वह घायल होकर ही रह गया। सभा में भगदड़ मच गयी। ऊधमसिंह चाहते, तो भाग सकते थे; पर वे सीना तानकर वहीं खड़े रहे और स्वयं को गिरफ्तार करा दिया।
न्यायालय में वीर ऊधमसिंह ने आरोपों को स्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा कि मैं पिछले 21 साल से प्रतिशोध की आग में जल रहा था। माइकेल ओडवायर और जैटलैंड मेरे देश भारत की आत्मा को कुचलना चाहते थे। इसका विरोध करना मेरा कर्त्तव्य था। इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य क्या होगा कि मैं अपनी मातृभूमि के लिए मर रहा हूँ।
ऊधमसिंह को 31 जुलाई, 1940 को पेण्टनविला जेल में फाँसी दे दी गयी। मरते समय उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा - 10 साल पहले मेरा प्यारा दोस्त भगतसिंह मुझे अकेला छोड़कर फाँसी चढ़ गया था। अब मैं उससे वहाँ जाकर मिलूँगा। वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के 27 साल बाद 19 जुलाई, 1974 को उनके भस्मावशेषों को भारत लाया गया। पाँच दिन उन्हें जनता के दर्शनार्थ रखकर ससम्मान हरिद्वार में प्रवाहित कर दिया गया।






