Saturday, December 6, 2014
Monday, November 3, 2014
Thursday, October 23, 2014
Thursday, October 2, 2014
तरुणोदय संकल्प सम्मलेन संकलित
नमस्कार,
सभी के सहयोग, अनथक प्रयास व योजकता से तरुणोदय संकल्प सम्मलेन के कार्यक्रम
संपन्न हुए |
कुल 410 स्थानों से 1947 की उपस्थिति रही, वर्तमान 192 सक्रिय केन्द्रों से
160 का प्रतिनिधित्व हुआ एवं 500 सक्रिय केन्द्रों का लक्ष्य निर्धारित हुआ |
सम्मेलनों के सफल आयोजन से तरुणोदय शिविर की तैयारी का अच्छा वातावरण बना है |
इस वातावरण को बनाए रखते हुए हम यशस्वी होंगे ही ऐसा विश्वास है |
जिलाशः संकलित वृत्त संलग्न है
Tuesday, September 16, 2014
तरुणोदय सन्देश मास अगस्त-सितम्बर 2014
तरुणोदय सन्देश
मास अगस्त-सितम्बर 2014 अंक 4
नमस्कार,अगस्त-सितम्बर मास का संयुक्तांक आपके सामने प्रस्तुत है | पाठकों से निवेदन है कि 'तरुणोदय सन्देश' को और अच्छा बनाने सम्बन्धी कोई सुझाव है अथवा कार्यक्षेत्र में कोई गतिविधि जो इसमें प्रकाशन के योग्य है तो tarunoday2014@gmail.com इस ईमेल पर प्रेषित करे |
11 सितम्बर विश्व बंधुत्व दिवस
प्राध्यापक संघ परिचय वर्ग (18 मई 2014 )
प्राध्यापक वर्ग समाज और राष्ट्र की
मुख्य धरोहर है | यह वर्ग संघ के विचारों को जानें और समाज निर्माण में अपनी भूमिका को सुनिश्चित करें, इसी आलोक में प्रांत में पांच विभागों पर 18 मई 2014 को प्राध्यापक संघ परिचय वर्ग का आयोजन किया गया |
अम्बाला,कुरुक्षेत्र ,रोहतक ,फरीदाबाद व भिवानी विभागों में आयोजित इन कार्यक्रमों में कुल 241 संख्या रही | भिवानी विभाग में ये कार्यक्रम जिला
स्तर पर किया गया | इन कार्यक्रमों में 11 वीं 12 वीं व ऊपर की कक्षाओं में पढ़ाने वाले
प्राध्यापकों ने भाग लिया |
कार्यक्रमों में संघ का परिचय, संघ पद्वति, संघ के विभिन्न आयाम और समाज निर्माण में प्राध्यापक कैसे अपनी
भूमिका निभा सकते है आदि विषयों पर चर्चा हुई | इन परिचय वर्गों में मा. अरुण जी (अखिल भारतीय सह संपर्क प्रमुख ), मा. सीताराम जी व्यास (क्षेत्रीय कार्यवाह ), श्री देवप्रसाद जी भारद्वाज (प्रांत कार्यवाह ) आदि वरिष्ठ
अधिकारियों का मार्गदर्शन प्राप्त हुआ |
भ्रमण कार्यक्रम
भिवानी विभाग के कॉलेज विद्यार्थी प्रमुखों का भ्रमण कार्यक्रम गत 15-18 अगस्त को चित्तोड़ में हुआ | कुल उपस्थिति 40 रही |
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| भिवानी विभाग के कॉलेज विद्यार्थी प्रमुखों का भ्रमण कार्यक्रम - हल्दी घाटी |
नूतन छात्र अभिनंदन
अगस्त मास के अंतिम सप्ताह में प्रान्त में कुछ स्थानों पर नूतन छात्र अभिनंदन के कार्यक्रम हुए | जिसमें गणपति इंस्टिट्यूट बिलासपुर, कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय, YMCA विश्वविद्यालय एवं गुरुग्राम के कुछ कार्यक्रम प्रमुख रूप से रहे |
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| कुरुक्षेत्र विवि में नूतन छात्र अभिनंदन |
अखण्ड भारत संकल्प दिवस
गत 14-15 अगस्त को प्रान्त भर में अखण्ड भारत संकल्प दिवस के कार्यक्रम बड़े उत्साह के साथ संपन्न हुए |
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| जींद |
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| फतेहाबाद |
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| बहादुरगढ़ |
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| राजीव गाँधी महाविद्यालय, उचाना जिला जींद |
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| महम |
संकलित वृत्त
पंचकुला 6 कार्यक्रम 137 संख्या
अम्बाला 4 कार्यक्रम 175संख्या
यमुनानगर 7 कार्यक्रम 123 संख्या
जगाधरी 1 कार्यक्रम 39 संख्या
कुरुक्षेत्र 2 कार्यक्रम 112 संख्या 70 अन्य
कैथल 4 कार्यक्रम 191 संख्या
करनाल 3 कार्यक्रम 152 संख्या
पानीपत 2 कार्यक्रम 190 संख्या
सोनीपत 3 कार्यक्रम 217 संख्या
जींद 2 कार्यक्रम 165 संख्या 50 अन्य
रोहतक 6 कार्यक्रम 230 संख्या 120 अन्य
झज्जर 2 कार्यक्रम 137 संख्या 68 अन्य
फरीदाबाद 6 कार्यक्रम 469 संख्या 106 अन्य
पलवल 5 कार्यक्रम 157 संख्या 50 अन्य
नुह 2 कार्यक्रम 28 संख्या 43 अन्य
गुरुग्राम 2 कार्यक्रम 64 संख्या
रेवाड़ी 1कार्यक्रम 37 संख्या
महेन्द्रगढ़ 2 कार्यक्रम 61 संख्या
भिवानी 1 कार्यक्रम 72 संख्या
हिसार 2 कार्यक्रम 155 संख्या
फतेहाबाद 2 कार्यक्रम 82 संख्या 31 अन्य
सिरसा 8 कार्यक्रम 535 संख्या 125 अन्य
कुल- 73 कार्यक्रम, 3528 संख्या, 663 अन्य*,
कुल संख्या 4191
विशेष
- दो कार्यक्रम कुरुक्षेत्र विश्वविद्यालय व हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय परिसर में भी हुए।
- दो स्थानों जींद व फतेहाबाद में कार्यक्रम के अंत में प्रभात फेरी के रूप में तिरंगा यात्रा भी निकाली गई। जिसमें जींद का कार्यक्रम निवासी शिविर के रूप में था।
- अन्य* में संस्थान परिसर में छात्राएं व नगर/खण्ड में स्वयंसेवकों/नागरिकों/स्कूल विद्यार्थियों की संख्या सम्मिलित है।
तरुणोदय सम्बन्धी पूर्ण सुचना
27 मार्च 2015 दोपहर 12.00 बजे से 29 मार्च 2015 अपराह्न 2.00 तक
बाबा मस्तनाथ विश्वविद्यालय, दिल्ली रोड़, रोहतक
12वीं, कॉलेज विद्यार्थी(ITI, DIPLOMA भी) एवं युवा प्राध्यापक
चार व्यायाम, सूर्यनमस्कार, गीत-संगठन गढ़े चलो(कंठस्थ) - इनका अभ्यास हो
शुल्क 200 रुपये, वेष खाकी नेकर सफेद कमीज
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विश्व हिंदु परिषद् - स्वर्ण जयंती वर्ष-2014
5 सितम्बर/इतिहास-स्मृति
पर्यावरण
संरक्षण हेतु अनुपम बलिदान
प्रतिवर्ष
पांच जून को हम ‘विश्व
पर्यावरण दिवस’ मनाते
हैं; लेकिन
यहदिन हमारे मन में सच्ची प्रेरणा नहीं जगा पाता। क्योंकि इसके साथ इतिहास की कोई
प्रेरक घटना के नहीं जुड़ी। इस दिन कुछ जुलूस, धरने,प्रदर्शन, भाषण
तो होते हैं; पर
उससे सामान्य लोगों के मन पर कोई असर नहीं होता। दूसरी ओर भारत
के
इतिहास में पाँच सितम्बर, 1730 को एक
ऐसी घटना घटी है, जिसकी
विश्व में कोई तुलना नहीं की जा सकती।
राजस्थान
तथा भारत के अनेक अन्य क्षेत्रों में बिश्नोई समुदाय के लोग रहते हैं। उनके गुरु
जम्भेश्वर जी ने अपने अनुयायियों को हरे पेड़ न काटने, पशु-पक्षियों को न मारने तथा जल गन्दा न करने जैसे 29 नियम दिये थे। इन 20 + 9 नियमों
के कारण उनके शिष्य बिश्नोई कहलाते हैं।
पर्यावरण
प्रेमी होने के कारण इनके गाँवों में पशु-पक्षी निर्भयता से विचरण करते हैं। 1730 में इन पर्यावरण-प्रेमियों के सम्मुख परीक्षा की वह
महत्वपूर्ण घड़ी आयी थी, जिसमें
उत्तीर्ण होकर इन्होंने विश्व-इतिहास में स्वयं को अमर कर लिया।
1730 ई0 में
जोधपुर नरेश अजय सिंह को अपने महल में निर्माण कार्य के लिए चूना और उसे पकाने के
लिए ईंधन की आवश्यकता पड़ी। उनके आदेश पर सैनिकों के साथ सैकड़ों लकड़हारे
निकटवर्ती गाँव खेजड़ली में शमी वृक्षों को काटने चल दिये।
जैसे
ही यह समाचार उस क्षेत्र में रहने वाले बिश्नोइयों को मिला, वे इसका विरोध करने लगेे। जब सैनिक नहीं माने, तो एक साहसी महिला ‘इमरती
देवी’ के
नेतृत्व में सैकड़ों ग्रामवासी; जिनमें
बच्चे और बड़े, स्त्री
और पुरुष सब शामिल थे; पेड़ों
से लिपट गये। उन्होंने सैनिकों को बता दिया कि उनकी देह के कटने के बाद ही कोई हरा
पेड़ कट पायेगा।
सैनिकों
पर भला इन बातों का क्या असर होना था ? वे राजज्ञा से बँधे थे, तो
ग्रामवासी धर्माज्ञा से। अतः वृक्षों के साथ ही ग्रामवासियों के अंग भी कटकर धरती
पर गिरने लगे। सबसे पहले वीरांगना ‘इमरती
देवी’ पर ही
कुल्हाड़ियों के निर्मम प्रहार हुए और वह वृक्ष-रक्षा के लिए प्राण देने वाली
विश्व की पहली महिला बन गयी।
इस
बलिदान से उत्साहित ग्रामवासी पूरी ताकत से पेड़ों से चिपक गये।20वीं शती में गढ़वाल (उत्तराखंड) में गौरा देवी, चण्डीप्रसाद भट्ट तथा सुन्दरलाल बहुगुणा ने वृक्षों के
संरक्षण के लिए ‘चिपको
आन्दोलन’चलाया, उसकी प्रेरणास्रोत इमरती
देवी ही थीं।
भाद्रपद
शुक्ल 10 (5 सितम्बर, 1730) को प्रारम्भ हुआ यह बलिदान-पर्व27 दिन तक चलता रहा। इस दौरान 363 लोगों ने बलिदान दिया। इनमें इमरती देवी की तीनों
पुत्रियों सहित 69 महिलाएँ
भी थीं। अन्ततः राजा ने स्वयं आकर क्षमा माँगी और हरे पेड़ों को काटने पर
प्रतिबन्ध लगा दिया। ग्रामवासियों को उससे कोई बैर तो था नहीं, उन्होंने राजा को क्षमा कर दिया।
उस
ऐतिहासिक घटना की याद में आज भी वहाँ ‘भाद्रपद
शुक्ल 10’ को
बड़ा मेला लगता है। राजस्थान शासन ने वन, वन्य
जीव तथा पर्यावरण-रक्षा हेतु ‘अमृता
देवी बिश्नोई स्मृति पुरस्कार’ तथा
केन्द्र शासन ने ‘अमृता
देवी बिश्नोई पुरस्कार’ देना
प्रारम्भ किया है। यह बलिदान विश्व इतिहास की अनुपम घटना है। इसलिए यही तिथि
(भाद्रपद शुक्ल 10 या
पाँच सितम्बर) वास्तविक ‘विश्व
पर्यावरण दिवस’ होने
योग्य है।
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Friday, September 12, 2014
Friday, August 15, 2014
अखण्ड भारत - मा. इन्द्रेश कुमार जी
सम्भवत: ही कोई पुस्तक (ग्रन्थ) होगी जिसमें यह वर्णन मिलता हो कि इन आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान , ( म्यांमार) , श्रीलंका (सिंहलद्वीप) , नेपाल, तिब्बत (त्रिविष्टप) , भूटान , पाकिस्तान,
मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया। यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह भू-प्रदेश कब , कैसे गुलाम हुए और स्वतन्त्र हुए। प्राय: पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। शेष इतिहास मिलता तो है परन्तु चर्चित नहीं है। सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है। - इन्द्रेश कुमार
सम्पूर्ण पृथ्वी का जब जल और थल इन दो तत्वों में वर्गीकरण करते हैं , तब सात द्वीप एवं सात महासमुद्र माने जाते हैं। हम इसमें से प्राचीन नाम जम्बूद्वीप जिसे आज एशिया द्वीप कहते हैं तथा इन्दू सरोवरम् जिसे आज हिन्दू महासागर कहते हैं , के निवासी हैं। इस जम्बूद्वीप (एशिया) के लगभग मध्य में हिमालय पर्वत स्थित है। हिमालय पर्वत में विश्व की सर्वाधिक ऊँची चोटी सागरमाथा, गौरीशंकर हैं , जिसे 1835 में अंग्रेज शासकों ने एवरेस्ट नाम देकर इसकी प्राचीनता व पहचान को बदलने का कूटनीतिक षड्यंत्र रचा। हम पृथ्वी पर जिस भू-भाग अर्थात् राष्ट्र के निवासी हैं उस भू-भाग का वर्णन अग्नि, वायु एवं विष्णु पुराण में लगभग समानार्थी श्लोक के रूप में है :-
उत्तरं यत् समुद्रस्य, हिमाद्रश्चैव दक्षिणम्।
वर्ष तद् भारतं नाम, भारती यत्र संतति।।
अर्थात् हिन्द महासागर के उत्तर में तथा हिमालय पर्वत के दक्षिण में जो भू-भाग है उसे भारत कहते हैं और वहां के समाज को भारती या भारतीय के नाम से पहचानते हैं।
वर्तमान में भारत के निवासियों का पिछले सैकडों हजारों वर्षों से हिन्दू नाम भी प्रचलित है और हिन्दुओं के देश को हिन्दुस्तान कहते हैं। विश्व के अनेक देश इसे हिन्द व नागरिक को हिन्दी व हिन्दुस्तानी भी कहते हैं। बृहस्पति आगम में इसके लिए निम्न श्लोक उपलब्ध है :-
हिमालयं समारम्भ्य यावद् इन्दु सरोवरम।
तं देव निर्मित देशं, हिन्दुस्थानं प्रचक्षते।।
अर्थात् हिमालय से लेकर इन्दु (हिन्द) महासागर तक देव पुरुषों द्वारा निर्मित इस भूगोल को हिन्दुस्तान कहते
हैं।
इन सब बातों से यह निश्चित हो जाता है कि भारतवर्ष और हिन्दुस्तान एक ही देश के नाम हैं तथा भारतीय और हिन्दू एक ही समाज के नाम हैं। जब हम अपने देश (राष्ट्र) का विचार करते हैं तब अपने समाज में प्रचलित एक परम्परा रही है , जिसमें किसी भी शुभ कार्य पर संकल्प पढ़ा अर्थात् लिया जाता है। संकल्प स्वयं में महत्वपूर्ण संकेत करता है। संकल्प में काल की गणना एवं भूखण्ड का विस्तृत वर्णन करते हुए , संकल्प कर्ता कौन है ? इसकी पहचान अंकित करने की परम्परा है। उसके अनुसार संकल्प में भू-खण्ड की चर्चा करते हुए बोलते (दोहराते) हैं कि जम्बूद्वीपे (एशिया) भरतखण्डे (भारतवर्ष) यही शब्द प्रयोग होता है। सम्पूर्ण साहित्य में हमारे राष्ट्र की सीमाओं का उत्तर में हिमालय व दक्षिण में हिन्द महासागर का वर्णन है ,
परन्तु पूर्व व पश्चिम का स्पष्ट वर्णन नहीं है। परंतु जब श्लोकों की गहराई में जाएं और भूगोल की पुस्तकों अर्थात् एटलस का अध्ययन करें तभी ध्यान में आ जाता है कि श्लोक में पूर्व व पश्चिम दिशा का वर्णन है। जब विश्व (पृथ्वी) का मानचित्र आँखों के सामने आता है तो पूरी तरह से स्पष्ट हो जाता है कि विश्व के भूगोल ग्रन्थों के अनुसार हिमालय के मध्य स्थल ‘ कैलाश मानसरोवर ' से पूर्व की ओर जाएं तो वर्तमान का इण्डोनेशिया और पश्चिम की ओर जाएं तो वर्तमान में ईरान देश अर्थात् आर्यान प्रदेश हिमालय के अंतिम छोर हैं। हिमालय 5000 पर्वत शृंखलाओं तथा 6000 नदियों को अपने भीतर समेटे हुए इसी प्रकार से विश्व के सभी भूगोल ग्रन्थ (एटलस) के अनुसार जब हम श्रीलंका (सिंहलद्वीप अथवा सिलोन) या कन्याकुमारी से पूर्व व पश्चिम की ओर प्रस्थान करेंगे या दृष्टि (नजर) डालेंगे तो हिन्द (इन्दु) महासागर इण्डोनेशिया व आर्यान (ईरान) तक ही है।
इन मिलन बिन्दुओं के पश्चात् ही दोनों ओर महासागर का नाम बदलता है। इस प्रकार से हिमालय, हिन्द महासागर, आर्यान (ईरान) व इण्डोनेशिया के बीच के सम्पूर्ण भू-भाग को आर्यावर्त अथवा भारतवर्ष अथवा हिन्दुस्तान कहा जाता है। प्राचीन भारत की चर्चा अभी तक की, परन्तु जब वर्तमान से 3000 वर्ष पूर्व तक के भारत की चर्चा करते हैं तब यह ध्यान में आता है कि पिछले 2500 वर्ष में जो भी आक्रांत यूनानी (रोमन ग्रीक) यवन , हूण , शक , कुषाण, सिरयन, पुर्तगाली , फेंच , डच , अरब , तुर्क, तातार, मुगल व अंग्रेज आदि आए, इन सबका विश्व के सभी इतिहासकारों ने वर्णन किया। परन्तु सभी पुस्तकों में यह प्राप्त होता है कि आक्रान्ताओं ने भारतवर्ष पर , हिन्दुस्तान पर आक्रमण किया है। सम्भवत: ही कोई पुस्तक (ग्रन्थ) होगी जिसमें यह वर्णन मिलता हो कि इन आक्रमणकारियों ने अफगानिस्तान, (म्यांमार), श्रीलंका (सिंहलद्वीप) , नेपाल, तिब्बत (त्रिविष्टप) , भूटान , पाकिस्तान , मालद्वीप या बांग्लादेश पर आक्रमण किया। यहां एक प्रश्न खड़ा होता है कि यह भू-प्रदेश कब , कैसे गुलाम हुए और स्वतन्त्र हुए। प्राय: पाकिस्तान व बांग्लादेश निर्माण का इतिहास तो सभी जानते हैं। शेष इतिहास मिलता तो है परन्तु चर्चित नहीं है।
सन 1947 में विशाल भारतवर्ष का पिछले 2500 वर्षों में 24वां विभाजन है। अंग्रेज का 350 वर्ष पूर्व के लगभग ईस्ट इण्डिया कम्पनी के रूप में व्यापारी बनकर भारत आना , फिर धीरे-धीरे शासक बनना और उसके पश्चात् सन 1857 से 1947 तक उनके द्वारा किया गया भारत का 7वां विभाजन है। आगे लेख में सातों विभाजन कब और क्यों किए गए इसका संक्षिप्त वर्णन है।
सन् 1857 में भारत का क्षेत्रफल 83 लाख वर्ग कि.मी. था। वर्तमान भारत का क्षेत्रफल 33 लाख वर्ग कि.मी. है। पड़ोसी 9 देशों का क्षेत्रफल 50 लाख वर्ग कि.मी. बनता है। भारतीयों द्वारा सन् 1857 के अंग्रेजों के विरुद्ध लड़े गए स्वतन्त्रता संग्राम (जिसे अंग्रेज ने गदर या बगावत कहा) से पूर्व एवं पश्चात् के परिदृश्य पर नजर दौडायेंगे तो ध्यान में आएगा कि ई. सन् 1800 अथवा उससे पूर्व के विश्व के देशों की सूची में वर्तमान भारत के चारों ओर जो आज देश माने जाते हैं उस समय देश नहीं थे। इनमें स्वतन्त्र राजसत्ताएं थीं , परन्तु सांस्कृतिक रूप में ये
सभी भारतवर्ष के रूप में एक थे और एक- दूसरे के देश में आवागमन (व्यापार , तीर्थ दर्शन , रिश्ते, पर्यटन आदि) पूर्ण रूप से बे-रोकटोक था। इन राज्यों के विद्वान् व लेखकों ने जो भी लिखा वह विदेशी यात्रियों ने लिखा ऐसा नहीं माना जाता है। इन सभी राज्यों की भाषाएं व बोलियों में अधिकांश शब्द संस्कृत के ही हैं। मान्यताएं
व परम्पराएं भी समान हैं। खान-पान, भाषा-बोली, वेशभूषा, संगीत-नृत्य, पूजापाठ, पंथ सम्प्रदाय में विविधताएं होते हुए भी एकता के दर्शन होते थे और होते हैं। जैसे-जैसे इनमें से कुछ राज्यों में भारत इतर
यानि विदेशी पंथ (मजहब-रिलीजन) आये तब अनेक संकट व सम्भ्रम निर्माण करने के प्रयास हुए।
सन 1857 के स्वतन्त्रता संग्राम से पूर्व-मार्क्स द्वारा अर्थ प्रधान परन्तु आक्रामक व हिंसक विचार के रूप में मार्क्सवाद जिसे लेनिनवाद , माओवाद , साम्यवाद , कम्यूनिज्म शब्दों से भी पहचाना जाता है, यह अपने पांव अनेक देशों में पसार चुका था। वर्तमान रूस व चीन जो अपने चारों ओर के अनेक छोटे-बडे राज्यों को अपने में समाहित कर चुके थे या कर रहे थे , वे कम्यूनिज्म के सबसे बडे व शक्तिशाली देश पहचाने जाते हैं। ये दोनों रूस और चीन विस्तारवादी, साम्राज्यवादी, मानसिकता वाले ही देश हैं। अंग्रेज का भी उस समय लगभग आधी दुनिया पर राज्य माना जाता था और उसकी साम्राज्यवादी, विस्तारवादी , हिंसक व कुटिलता स्पष्ट रूप से
सामने थी। अफगानिस्तान :- सन् 1834 में प्रकिया प्रारम्भ हुई और 26 मई, 1876 को रूसी व ब्रिटिश शासकों (भारत) के बीच गंडामक संधि के रूप में निर्णय हुआ और अफगानिस्तान नाम से एक बफर स्टेट अर्थात् राजनैतिक देश को दोनों ताकतों के बीच स्थापित किया गया। इससे अफगानिस्तान अर्थात् पठान भारतीय स्वतन्त्रता संग्राम से अलग हो गए तथा दोनों ताकतों ने एक-दूसरे से अपनी रक्षा का मार्ग भी खोज
लिया। परंतु इन दोनों पूंजीवादी व मार्क्सवादी ताकतों में अंदरूनी संघर्ष सदैव बना रहा कि अफगानिस्तान पर नियन्त्रण किसका हो ?
अफगानिस्तान (उपगणस्तान) शैव व प्रकृति पूजक मत से बौद्ध मतावलम्बी और फिर विदेशी पंथ इस्लाम
मतावलम्बी हो चुका था। बादशाह शाहजहाँ, शेरशाह सूरी व महाराजा रणजीत सिंह के शासनकाल में उनके राज्य में कंधार (गंधार) आदि का स्पष्ट वर्णन मिलता है।
नेपाल :- मध्य हिमालय के 46 से अधिक छोटे-बडे राज्यों को संगठित कर पृथ्वी नारायण शाह नेपाल नाम से एक राज्य का सुगठन कर चुके थे। स्वतन्त्रता संग्राम के सेनानियों ने इस क्षेत्र में अंग्रेजों के विरुद्ध लडते समय-समय पर शरण ली थी। अंग्रेज ने विचारपूर्वक 1904 में वर्तमान के बिहार स्थित सुगौली नामक स्थान पर उस समय के पहाड़ी राजाओं के नरेश से संधी कर नेपाल को एक स्वतन्त्र अस्तित्व प्रदान कर अपना रेजीडेंट बैठा दिया। इस प्रकार से नेपाल स्वतन्त्र राज्य होने पर भी अंग्रेज के अप्रत्यक्ष अधीन ही था। रेजीडेंट के बिना महाराजा को कुछ भी खरीदने तक की अनुमति नहीं थी। इस कारण राजा-महाराजाओं में जहां आन्तरिक तनाव था, वहीं अंग्रेजी नियन्त्रण से कुछ में घोर बेचैनी भी थी। महाराजा त्रिभुवन सिंह ने 1953 में भारतीय सरकार को निवेदन किया था कि आप नेपाल को अन्य राज्यों की तरह भारत में मिलाएं। परन्तु सन
1955 में रूस द्वारा दो बार वीटो का उपयोग कर यह कहने के बावजूद कि नेपाल तो भारत का ही अंग है , भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने पुरजोर वकालत कर नेपाल को स्वतन्त्र देश के रूप में यू.एन.ओ. में मान्यता दिलवाई। आज भी नेपाल व भारतीय एक-दूसरे के देश में विदेशी नहीं हैं और यह भी सत्य है कि नेपाल को वर्तमान भारत के साथ ही सन् 1947 में ही स्वतन्त्रता प्राप्त हुई। नेपाल 1947 में ही अंग्रेजी रेजीडेसी से मुक्त हुआ।
भूटान :- सन 1906 में सिक्किम व भूटान जो कि वैदिक- बौद्ध मान्यताओं के मिले-जुले समाज के छोटे भू-भाग थे| इन्हें स्वतन्त्रता संग्राम से लगकर अपने प्रत्यक्ष नियन्त्रण से रेजीडेंट के माध्यम से रखकर चीन के विस्तारवाद पर अंग्रेज ने नजर रखना प्रारम्भ किया। ये क्षेत्र(राज्य) भी स्वतन्त्रता सेनानियों एवं समय-समय पर हिन्दुस्तान के उत्तर दक्षिण व पश्चिम के भारतीय सिपाहियों व समाज के नाना प्रकार के विदेशी हमलावरों से युद्धों में पराजित होने पर शरणस्थली के रूप में काम आते थे। दूसरा ज्ञान (सत्य , अहिंसा, करुणा) के उपासक वे क्षेत्र खनिज व वनस्पति की दृष्टि से महत्वपूर्ण थे। तीसरा यहां के जातीय जीवन को धीरे-धीरे मुख्य
भारतीय (हिन्दू) धारा से अलग कर मतान्तरित किया जा सकेगा। हम जानते हैं कि सन 1836 में उत्तर भारत में चर्च ने अत्यधिक विस्तार कर नये आयामों की रचना कर डाली थी। सुदूर हिमालयवासियों में ईसाईयत जोर पकड़ रही थी।
तिब्बत :- सन 1914 में तिब्बत को केवल एक पार्टी मानते हुए चीनी साम्राज्यवादी सरकार व भारत के काफी बड़े भू-भाग पर कब्जा जमाए अंग्रेज शासकों के बीच एक समझौता हुआ। भारत और चीन के बीच तिब्बत को एक बफर स्टेट के रूप में मान्यता देते हुए हिमालय को विभाजित करने के लिए मैकमोहन रेखा निर्माण करने का निर्णय हुआ। हिमालय सदैव से ज्ञान-विज्ञान के शोध व चिन्तन का केंद्र रहा है। हिमालय को बांटना और तिब्बत व भारतीय को अलग करना यह षड्यंत्र रचा गया। चीनी और अंग्रेज शासकों ने एक-दूसरों के विस्तारवादी, साम्राज्यवादी मनसूबों को लगाम लगाने के लिए कूटनीतिक खेल खेला। अंग्रेज ईसाईयत
हिमालय में कैसे अपने पांव जमायेगी, यह सोच रहा था परन्तु समय ने कुछ ऐसी करवट ली कि प्रथम व
द्वितीय महायुद्ध के पश्चात् अंग्रेज को एशिया और विशेष रूप से भारत छोड़कर जाना पड़ा। भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री पं. नेहरू ने समय की नाजकता को पहचानने में भूल कर दी और इसी कारण तिब्बत को सन 1949 से 1959 के बीच चीन हड़पने में सफल हो गया। पंचशील समझौते की समाप्ति के साथ ही अक्टूबर सन 1962 में
चीन ने भारत पर हमला कर हजारों वर्ग कि.मी. अक्साई चीन (लद्दाख यानि जम्मू-कश्मीर) व अरुणाचल
आदि को कब्जे में कर लिया। तिब्बत को चीन का भू-भाग मानने का निर्णय पं. नेहरू (तत्कालीन प्रधानमंत्री)
की भारी ऐतिहासिक भूल हुई। आज भी तिब्बत को चीन का भू- भाग मानना और चीन पर तिब्बत की निर्वासित सरकार से बात कर मामले को सुलझाने हेतु दबाव न डालना बड़ी कमजोरी व भूल है। नवम्बर 1962 में भारत के दोनों सदनों के संसद सदस्यों ने एकजुट होकर चीन से एक-एक इंच जमीन खाली करवाने का संकल्प लिया। आश्चर्य है भारतीय नेतृत्व (सभी दल) उस संकल्प को शायद भूल ही बैठा है। हिमालय परिवार नाम के आन्दोलन ने उस दिवस को मनाना प्रारम्भ किया है ताकि जनता नेताओं द्वारा लिए गए संकल्प को याद करवाएं।
श्रीलंका व म्यांमार :- अंग्रेज प्रथम महायुद्ध (1914 से 1919) जीतने में सफल तो हुए परन्तु भारतीय सैनिक
शक्ति के आधार पर। धीरे-धीरे स्वतन्त्रता प्राप्ति हेतु क्रान्तिकारियों के रूप में भयानक ज्वाला अंग्रेज को भस्म करने लगी थी। सत्याग्रह, स्वदेशी के मार्ग से आम जनता अंग्रेज के कुशासन के विरुद्ध खडी हो रही थी। द्वितीय महायुद्ध के बादल भी मण्डराने लगे थे। सन् 1935 व 1937 में ईसाई ताकतों को लगा कि उन्हें कभी भी भारत व एशिया से बोरिया-बिस्तर बांधना पड़ सकता है। उनकी अपनी स्थलीय शक्ति मजबूत नहीं है और न ही वे दूर से नभ व थल से वर्चस्व को बना सकते हैं। इसलिए जल मार्ग पर उनका कब्जा होना चाहिए तथा जल के किनारों पर भी उनके हितैषी राज्य होने चाहिए। समुद्र में अपना नौसैनिक बेड़ा बैठाने, उसके समर्थक राज्य स्थापित करने तथा स्वतन्त्रता संग्राम से उन भू-भागों व समाजों को अलग करने हेतु सन 1965 में श्रीलंका व सन 1937 में म्यांमार को अलग राजनीतिक देश की मान्यता दी। ये दोनों देश इन्हीं वर्षों को अपना स्वतन्त्रता दिवस मानते हैं। म्यांमार व श्रीलंका का अलग अस्तित्व प्रदान करते ही मतान्तरण का पूरा ताना-बाना जो पहले तैयार था उसे अधिक विस्तार व सुदृढ़ता भी इन देशों में प्रदान की गई। ये दोनों देश वैदिक , बौद्ध धार्मिक
परम्पराओं को मानने वाले हैं। म्यांमार के अनेक स्थान विशेष रूप से रंगून का अंग्रेज द्वारा देशभक्त भारतीयों को कालेपानी की सजा देने के लिए जेल के रूप में भी उपयोग होता रहा है।
पाकिस्तान , बांग्लादेश व मालद्वीप :- 1905 का लॉर्ड कर्जन का बंग-भंग का खेल 1911 में बुरी तरह से विफल हो गया। परन्तु इस हिन्दु मुस्लिम एकता को तोड़ने हेतु अंग्रेज ने आगा खां के नेतृत्व में सन 1906 में मुस्लिम लीग की स्थापना कर मुस्लिम कौम का बीज बोया। पूर्वोत्तर भारत के अधिकांश जनजातीय जीवन
को ईसाई के रूप में मतान्तरित किया जा रहा था। ईसाई बने भारतीयों को स्वतन्त्रता संग्राम से पूर्णत: अलग रखा गया। पूरे भारत में एक भी ईसाई सम्मेलन में स्वतन्त्रता के पक्ष में प्रस्ताव पारित नहीं हुआ। दूसरी ओर
मुसलमान तुम एक अलग कौम हो , का बीज बोते हुए सन् 1940 में मोहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व में पाकिस्तान की मांग खड़ी कर देश को नफरत की आग में झोंक दिया। अंग्रेजीयत के दो एजेण्ट क्रमश: पं. नेहरू
व मो. अली जिन्ना दोनों ही घोर महत्वाकांक्षी व जिद्दी (कट्टर) स्वभाव के थे। अंग्रेजों ने इन दोनों का उपयोग गुलाम भारत के विभाजन हेतु किया। द्वितीय महायुद्ध में अंग्रेज बुरी तरह से आर्थिक, राजनीतिक दृष्टि से इंग्लैण्ड में तथा अन्य देशों में टूट चुके थे। उन्हें लगता था कि अब वापस जाना ही पड़ेगा और अंग्रेजी साम्राज्य में कभी न अस्त होने वाला सूर्य अब अस्त भी हुआ करेगा। सम्पूर्ण भारत देशभक्ति के स्वरों के साथ सड़क पर आ चुका था। संघ , सुभाष, सेना व समाज सब अपने-अपने ढंग से स्वतन्त्रता की अलख जगा रहे थे। सन 1948 तक प्रतीक्षा न करते हुए 3 जून, 1947 को अंग्रेज अधीन भारत के विभाजन व स्वतन्त्रता की घोषणा औपचारिक रूप से कर दी गयी। यहां यह बात ध्यान में रखने वाली है कि उस समय भी भारत की 562 ऐसी छोटी-बड़ी रियासतें (राज्य) थीं, जो अंग्रेज के अधीन नहीं थीं। इनमें से सात ने आज के पाकिस्तान में तथा 555 ने जम्मू-कश्मीर सहित आज के भारत में विलय किया। भयानक रक्तपात व जनसंख्या की अदला-बदली के बीच 14, 15 अगस्त, 1947 की मध्यरात्रि में पश्चिम एवं पूर्व पाकिस्तान बनाकर अंग्रेज ने भारत का 7वां विभाजन कर डाला। आज ये दो भाग पाकिस्तान व बांग्लादेश के नाम से जाने जाते हैं। भारत के दक्षिण में सुदूर समुद्र में मालद्वीप (छोटे-छोटे टापुओं का समूह) सन 1947 में स्वतन्त्र देश बन गया , जिसकी चर्चा व जानकारी होना अत्यन्त महत्वपूर्ण व उपयोगी है। यह बिना किसी आन्दोलन व मांग के हुआ है।
भारत का वर्तमान परिदृश्य :- सन 1947 के पश्चात् फेंच के कब्जे से पाण्डिचेरी, पुर्तगीज के कब्जे से गोवा देव- दमन तथा अमेरिका के कब्जें में जाते हुए सिक्किम को मुक्त करवाया है। आज पाकिस्तान में पख्तून, बलूच, सिंधी, बाल्टीस्थानी (गिलगित मिलाकर), कश्मीरी मुजफ्फरावादी व मुहाजिर नाम से इस्लामाबाद (लाहौर) से आजादी के आन्दोलन चल रहे हैं। पाकिस्तान की 60 प्रतिशत से अधिक जमीन तथा 30 प्रतिशत से अधिक जनता पाकिस्तान से ही आजादी चाहती है। बांग्लादेश में बढ़ती जनसंख्या का विस्फोट, चटग्राम आजादी आन्दोलन उसे जर्जर कर रहा है। शिया-सुन्नी फसाद, अहमदिया व वोहरा (खोजा-मल्कि) पर होते जुल्म मजहबी टकराव को बोल रहे हैं। हिन्दुओं की सुरक्षा तो खतरे में ही है। विश्वभर का एक भी मुस्लिम देश इन दोनों देशों के मुसलमानों से थोडी भी सहानुभूति नहीं रखता। अगर सहानुभूति होती तो क्या इन देशों के 3 करोड़ से अधिक मुस्लिम (विशेष रूप से बांग्लादेशीय) दर-दर भटकते। ये मुस्लिम देश अपने किसी भी सम्मेलन में इनकी मदद हेतु आपस में कुछ-कुछ लाख बांटकर सम्मानपूर्वक बसा सकने का निर्णय ले सकते थे। परन्तु कोई भी मुस्लिम देश आजतक बांग्लादेशी मुसलमान की मदद में आगे नहीं आया। इन घुसपैठियों के कारण भारतीय मुसलमान अधिकाधिक गरीब व पिछड़ते जा रहा है क्योंकि इनके विकास की योजनाओं पर खर्च होने वाले धन व नौकरियों पर ही तो घुसपैठियों का कब्जा होता जा रहा है। मानवतावादी वेष को धारण कराने वाले देशों में से भी कोई आगे नहीं आया कि इन घुसपैठियों यानि दरबदर होते नागरिकों को अपने यहां बसाता या अन्य किसी प्रकार की सहायता देता। इन दर-बदर होते नागरिकों के आई.एस.आई. के एजेण्ट बनकर काम करने के कारण ही भारत के करोडों मुस्लिमों को भी सन्देह के घेरे में खड़ा कर दिया है। आतंकवाद व माओवाद लगभग 200 समूहों के रूप में भारत व भारतीयों को डस रहे हैं। लाखों उजड़ चुके हैं , हजारों विकलांग हैं और हजारों ही मारे जा चुके हैं। विदेशी ताकतें हथियार, प्रशिक्षण व जेहादी, मानसिकता देकर उन प्रदेश के लोगों के द्वारा वहां के ही लोगों को मरवा कर उन्हीं प्रदेशों को बर्बाद करवा रही हैं। इस विदेशी षड्यन्त्र को भी समझना आवश्यक है।
सांस्कृतिक व आर्थिक समूह की रचना आवश्यकता :- आवश्यकता है वर्तमान भारत व पड़ोसी भारतखण्डी देशों को एकजुट होकर शक्तिशाली बन खुशहाली अर्थात विकास के मार्ग में चलने की। इसलिए अंग्रेज अर्थात् ईसाईयत द्वारा रचे गये षड्यन्त्र को ये सभी देश (राज्य) समझें और साझा व्यापार व एक करन्सी निर्माण कर नए होते इस क्षेत्र के युग का सूत्रपात करें। इन देशों 10 का समूह बनाने से प्रत्येक देश का भय का वातावरण समाप्त हो जायेगा तथा प्रत्येक देश का प्रतिवर्ष के सैंकड़ों-हजारों-करोड़ों रुपये रक्षा व्यय के रूप में बचेंगे जो कि विकास पर खर्च किए जा सकेंगे। इससे सभी सुरक्षित रहेंगे व विकसित होंगे।
- लेखक राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वरिष्ठ प्रचारक एवं राष्ट्रीय कार्यकारिणी सदस्य हैं।
Wednesday, July 16, 2014
तरुणोदय सन्देश - जून-जुलाई 2014
तरुणोदय सन्देश
मास जून-जुलाई 2014 अंक 3
जून मास में संघ शिक्षा वर्ग के कारण पिछला अंक प्रकाशित नहीं कर पाए अतः खेद प्रकट करते है | जून व जुलाई का यह संयुक्त अंक आपके लिए प्रस्तुत है | पाठकों से निवेदन है कि 'तरुणोदय सन्देश' को और अच्छा बनाने सम्बन्धी कोई सुझाव है अथवा कार्यक्षेत्र में कोई गतिविधि जो इसमें प्रकाशन के योग्य है तो tarunoday2014@gmail.com इस ईमेल पर प्रेषित करे |
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| परम पवित्र भगवा ध्वज |
गुरु पूर्णिमा पर विशेष
मगध के छिन्न-भिन्न हो रहे साम्राज्य को कौन बचाता अगर चन्द्रगुप्त के चाणक्य ना होते? बर्बर मुस्लिम आक्रमणकारियों से हिन्दू राष्ट्र की रक्षा कौन करता अगर छत्रपति शिवाजी के समर्थ गुरु रामदास ना होते? गुरू गोविंद सिंह का खलसा पंथ कैसे सिरजा जाता तथा भारत और समाज की रक्षा कैसे होती अगर गुरु ग्रंथ साहिब की अमर बाणी ना होती? वर्तमान भारतवर्ष की पराधीनता की बेडि़यां तोड़कर स्वतंत्रता और हिन्दू स्वाभिमान की क्रांति कैसे प्रारंभ होती अगर डा. हेडगेवार के साथ भगवा ध्वज की शाश्वत बलिदानी परम्परा का गुरु-बल ना होता?
भारत के प्राण सभ्यतामूलक संस्थाओं में बसे हैं। माता, पिता और गुरु-ये वे संस्थान हैं जिन्होंने इस देश की हवा, पानी और मिट्टी को बचाया। रामचरित मानस में श्रीराम के बाल्यकाल के गुणों में सबसे प्रमुख है मात-पिता गुरु नाविही माथा। वे माता-पिता और गुरु के आदेश से बंधे थे और जो भी धर्म तथा देश के हित में हो वही आदेश उन्हें माता-पिता और गुरु से प्राप्त होता था। जब वे किशोरवय ही थे और उनकी मसें भी नहीं भीगी थीं तभी गुरु वशिष्ठ उन्हें देश, धर्म और समाज की रक्षा के लिए उनके पिता दशरथ से मांग कर ले गये। जब देश संकट में हो और धर्म पर मर्दायाहीनता का आक्रमण हो तो समाज के तरुण और युवा शक्ति क्या सिर्फ अपना कैरियर और भविष्य को बनाने में लगी रहे? यह गुरू का ही प्रताप और मार्गदर्शन होता है कि वह समाज को राष्ट्र तथा धर्म की रक्षा के लिए जागृत और चैतन्य करे।
यदि राष्ट्र के घटकों की स्मृति में त्याग, तप और बलिदान की विजयशाली परम्परा जीवित है तो दुनिया की कोई शक्ति ना उन्हें परस्त कर सकती है और ना ही पराधीन बना सकती है।
जब कश्मीर के हिन्दू पंडितों पर संकट आया और इस्लाम के आक्रमणकारियों ने उन्हें घाटी से बाहर खदेड़ दिया तो कश्मीर से 11 पंडित गुरु तेग बहादुर साहिब के पास आये। उनकी व्यथा सुनकर गुरु तेग बहादुर साहिब बहुत पीडि़त हुए। उनके मुंह से शब्द निकले कि आपकी रक्षा के लिए तो किसी महापुरुष को बलिदान देना होगा। उस समय नन्हें बालक गोबिंद सिंह, जो कालांतर में गुरु गोबिंद कहलाए, हाथ जोड़कर बोले, हे सच्चे पातशाह, आपसे बढ़कर महापुरुष कौन हो सकता है? गुरु तेग बहादुर साहिब ने गोबिंद सिंह को आशीर्वाद दिया और कश्मीरी पंडितों की रक्षा की। यह गुरु तेग बहादुर साहिब का बलिदान ही था कि उन्हें हिन्द की चादर कहा गया। गुरु तेग बहादुर के बलिदान के बाद गुरु गोबिंद सिंह जी के दोनों साहिबजादे, जोरावर सिंह और फतेह सिंह सरहंद के किले में काजी के द्वारा जिंदा दीवार में चिनवा दिये गये। वीर हकीकत राय ने धर्म के लिए प्राण दे दिये लेकिन धर्म नहीं छोड़ा। यह कौन सी शक्ति थी जो उनके पीछे काम कर रही थी? वह कौन सा ज्ञान धन था कि जिसने इन वीरों के ह्रदय में राष्ट्रधर्म की रक्षा के लिए आत्मोत्सर्ग करने की हिम्मत भर दी? आचार्य बंकिमचन्द्र चट्टोपाध्याय ने अपनी अमरकृति आनंद मठ में उन्हीं महान आचार्यों की खड्गधारी परम्परा का अद्भुत और आग्नेय वर्णन किया है जो भवानी भारती की रक्षा के लिए शत्रु दल का वैसे ही संहार करते गये जैसे महिषासुर मर्दिनी शत्रुओं का दलन करती है। वंदेमातरम् के जयघोष के साथ जब संन्यासी योद्धा अश्व पर सवार होकर शत्रुओं पर वार करते थे तो अरिदल संख्या में अधिक होते हुए भी काई की तरह फटता जाता था। वंदेमातरम् से विजयी आकाश नादित हो उठता था।
डा. केशव बलिराम हेडगेवार ने 1925 में जब राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की स्थापना की तो परम पवित्र भगवा ध्वज को अपना गुरू मानने के पीछे यही कारण था कि वे शताब्दियों से सिंचित सभ्यता और संस्कृति के बल से हिन्दू राष्ट्र को जीवंत करना चाहते थे। यदि राष्ट्र के घटकों की स्मृति में त्याग, तप और बलिदान की विजयशाली परम्परा जीवित है तो दुनिया की कोई शक्ति ना उन्हें परस्त कर सकती है और ना ही पराधीन बना सकती है। भगवा ध्वज रामकृष्ण, दक्षिण के चोल राजाओं, सम्राट कृष्णदेव राय, छत्रपति शिवाजी, गुरु गोबिंद सिंह और महाराजा रणजीत सिंह की पराक्रमी परम्परा और सदा विजयी भाव का सर्वश्रेष्ठ प्रतीक है। इसमें यदि सम्राट हर्ष और विक्रमादित्य का प्रजा वत्सल राज्य अभिव्यक्त होता है तो व्यास, दधीचि और समर्थ गुरु रामदास से लेकर स्वामी रामतीर्थ, स्वामी दयानंद, महर्षि अरविंद, रामकृष्ण परमहंस और स्वामी विवेकानंद तक का वह आध्यात्मिक तेज भी प्रकट होता है जिसने राष्ट्र और धर्म को संयुक्त किया तथा आदिशंकर की वाणी से यह घोषित करवाया कि राष्ट्र को जोड़ते हुए ही धर्म प्रतिष्ठित हो सकता है। जो धर्म साधना राष्ट्र और जन से विमुख हो केवल अपने मोक्ष के लिए कामना करे वह धर्म साधना भारत के गुरुओं ने कभी प्रतिष्ठित नहीं की। स्वामी विवेकानंद ने रामकृष्ण मिशन की स्थापना करते हुए उसका उद्देश्य 'आत्मनो मोक्षार्थ जगद् हिताय च' रखा। अर्थात मनुष्यों के कल्याण में ही मेरा मोक्ष है।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ भारत का रक्षा कवच बना और उसके स्वयंसेवक प्रधानमंत्री पद से लेकर देश के सीमावर्ती गांवों तक में भारत के नये अभ्युदय के लिए कार्य कर रहे हैं और इसके पीछे भारत की सभ्यता और संस्कृति का तपोमय बल है जो गुरु परम्परा से ही जीवित रहा है। इसलिए गुरु पूर्णिमा के अवसर पर देश भर में करोड़ों स्वयंसेवक भगवा ध्वज के समक्ष प्रणाम निवेदित करते हुए शुद्ध समर्पण भाव से गुरु-दक्षिणा अर्पित करते हैं। यह न तो शुल्क है और न ही चंदा। यह राष्ट्र के लिए बलिदानी भाव से ओत-प्रोत स्वयंसेवकों का श्रद्धामय प्रणाम ही होता है जो दक्षिणा राष्ट्र रक्षा करते हुए शिवाजी ने समर्थ गुरु रामदास को दी। राष्ट्र रक्षा का वही संकल्प संघ के स्वयंसेवक भगवा ध्वज को अर्पित करते हैं।
गुरुग्राम नगर में एकत्रीकरण के दृश्य
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| गुरुग्राम नगर एकत्रीकरण |
"प्रशिक्षण वर्ग संपन्न"
गत 1-22 जून को हरियाणा प्रान्त का संघ शिक्षा वर्ग प्रथम वर्ष सामान्य श्रीमद भगवद गीता वरिष्ठ माध्यमिक विद्यालय, कुरुक्षेत्र में संपन्न हुआ | जिसमें प्रान्त भर से 262 स्थानों से 468 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया जिसमें 116 महाविद्यालयीन विद्यार्थी भी सम्मिलित है |
इसी प्रकार तृतीय वर्ष सामान्य में 14, द्वितीय वर्ष सामान्य में 73, प्रथम वर्ष विशेष में 49 व द्वितीय वर्ष विशेष में 32 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण प्राप्त किया |
जून मास के अंतिम सप्ताह में विभाग अनुसार संपन्न हुए 7 प्राथमिक शिक्षा वर्गों में 627 स्थानों से 1796 शिक्षार्थियों ने प्रशिक्षण लिया |
प्रान्त बैठक संपन्न
गत 12-13 जुलाई 2014 को शिक्षा भारती, जगदीश कालोनी, रोहतक में नगर/खंड पर्यंत कॉलेज विद्यार्थी प्रमुखों की प्रान्त बैठक संपन्न हुई | प्रान्त भर से 18 जिलों से 60 कार्यकर्ता बैठक में उपस्थित रहे | बैठक में गत कार्यों की समीक्षा (यथा तैयारी के चरण, पंजीकरण की स्थिति, प्रशिक्षण वर्ग), 'तरुणोदय शिविर' को ध्यान में रखते हुए प्रान्त में महाविद्यालयीन कार्य की स्थिति एवं आगामी योजना, अपने क्षेत्र में सक्रिय केन्द्रों की योजना व उसके स्थायित्व की ओर ध्यान इन विषयों पर विचार व अधिकारियों द्वारा मार्गदर्शन हुआ | बैठक में समारोप में मा.सीताराम जी व्यास, उत्तर क्षेत्र कार्यवाह का पाथेय के रूप में उदबोधन हुआ | प्रान्त प्रचारक श्री सुधीर कुमार जी व सह प्रान्त कार्यवाह श्री प्रताप सिंह जी का मार्गदर्शन भी बैठक में प्राप्त हुआ |
"तरुणोदय शिविर" की तिथियाँ 27-28-29 मार्च 2015 निश्चित हो चुकी हैं। प.पू. सरसंघचालक जी का मार्गदर्शन प्राप्त होगा।
तैयारी के चरणों में कुछ संशोधन है, कृपया उसी अनुसार अपने यहाँ योजना बने व प्रयास हो |
- 15 अगस्त 2014 - प्रत्येक नगर/खण्ड का कॉलेज विद्यार्थी(12वीं भी) एकत्रीकरण रूप में अखण्ड भारत संकल्प दिवस कार्यक्रम
- 25-31 अगस्त - छात्रावासों/कॉलेज परिसरों में नूतन छात्र अभिनन्दन कार्यक्रम
- 19-20-21 सितम्बर - जिलानुसार तरुणोदय संकल्प शिविर। (पंजीकरण की अंतिम तिथि भी यही रहेगी)।
अपने को जो अतिरिक्त समय शिविर तैयारी हेतु मिला है, उसका हम बढ़िया से उपयोग करें।
19 जुलाई/इतिहास-स्मृति - जलियांवाला के प्रतिशोधी ऊधमसिंह
ऊधमसिंह का जन्म ग्राम सुनाम ( जिला संगरूर, पंजाब) में 26 दिसम्बर, 1899 को सरदार टहलसिंह के घर में हुआ था। मात्र दो वर्ष की अवस्था में ही इनकी माँ का और सात साल का होने पर पिता का देहान्त हो गया। ऐसी अवस्था में किसी परिवारजन ने इनकी सुध नहीं ली। गली-गली भटकने के बाद अन्ततः इन्होंने अपने छोटे भाई के साथ अमृतसर के पुतलीघर में शरण ली। यहाँ एक समाजसेवी ने इनकी सहायता की।
19 वर्ष की तरुण अवस्था में ऊधमसिंह ने 13 अपै्रल, 1919 को बैसाखी के पर्व पर जलियाँवाला बाग, अमृतसर में हुए नरसंहार को अपनी आँखों से देखा। सबके जाने के बाद रात में वे वहाँ गये और रक्तरंजित मिट्टी माथे से लगाकर इस काण्ड के खलनायकों से बदला लेने की प्रतिज्ञा की। कुछ दिन उन्होंने अमृतसर में एक दुकान भी चलायी। उसके फलक पर उन्होंने अपना नाम ‘राम मोहम्मद सिंह आजाद’ लिखवाया था। इससे स्पष्ट है कि वे स्वतन्त्रता के लिए सब धर्म वालों का सहयोग चाहते थे।
ऊधमसिंह को सदा अपना संकल्प याद रहता था। उसे पूरा करने हेतु वे अफ्रीका से अमरीका होते हुए 1923 में इंग्लैंड पहुँच गये। वहाँ क्रान्तिकारियों से उनका सम्पर्क हुआ। 1928 में वे भगतसिंह के कहने पर वापस भारत आ गये; पर लाहौर में उन्हें शस्त्र अधिनियम के उल्लंघन के आरोप में पकड़कर चार साल की सजा दी गयी। इसके बाद वे फिर इंग्लैंड चले गये। तब तक जलियांवाला बाग में गोली चलाने वाला जनरल डायर अनेक शारीरिक व मानसिक रोगों से ग्रस्त होकर 23 जुलाई, 1927 को आत्महत्या कर चुका था; पर पंजाब का तत्कालीन गवर्नर माइकेल ओडवायर अभी जीवित था।
13 मार्च, 1940 को वह शुभ दिन आ गया, जिस दिन ऊधमसिंह को अपना संकल्प पूरा करने का अवसर मिला। इंग्लैंड की राजधानी लन्दन के कैक्स्टन हॉल में एक सभा होने वाली थी। इसमें जलियाँवाला बाग काण्ड के दो खलनायक सर माइकेल ओडवायर तथा भारत के तत्कालीन सेक्रेटरी अ१फ स्टेट लार्ड जेटलैंड आने वाले थे। ऊधमसिंह चुपचाप मंच से कुछ दूरी पर जाकर बैठ गये और उचित समय की प्रतीक्षा करने लगे।
माइकेल ओडवायर ने अपने भाषण में भारत के विरुद्ध बहुत विषवमन किया। भाषण पूरा होते ही ऊधमसिंह ने गोली चला दी। ओडवायर वहीं ढेर हो गया। अब लार्ड जैटलैंड की बारी थी; पर उसका भाग्य अच्छा था। वह घायल होकर ही रह गया। सभा में भगदड़ मच गयी। ऊधमसिंह चाहते, तो भाग सकते थे; पर वे सीना तानकर वहीं खड़े रहे और स्वयं को गिरफ्तार करा दिया।
न्यायालय में वीर ऊधमसिंह ने आरोपों को स्वीकार करते हुए स्पष्ट कहा कि मैं पिछले 21 साल से प्रतिशोध की आग में जल रहा था। माइकेल ओडवायर और जैटलैंड मेरे देश भारत की आत्मा को कुचलना चाहते थे। इसका विरोध करना मेरा कर्त्तव्य था। इससे बढ़कर मेरा सौभाग्य क्या होगा कि मैं अपनी मातृभूमि के लिए मर रहा हूँ।
ऊधमसिंह को 31 जुलाई, 1940 को पेण्टनविला जेल में फाँसी दे दी गयी। मरते समय उन्होंने मुस्कुराते हुए कहा - 10 साल पहले मेरा प्यारा दोस्त भगतसिंह मुझे अकेला छोड़कर फाँसी चढ़ गया था। अब मैं उससे वहाँ जाकर मिलूँगा। वह मेरी प्रतीक्षा कर रहा होगा।
स्वतन्त्रता प्राप्ति के 27 साल बाद 19 जुलाई, 1974 को उनके भस्मावशेषों को भारत लाया गया। पाँच दिन उन्हें जनता के दर्शनार्थ रखकर ससम्मान हरिद्वार में प्रवाहित कर दिया गया।
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